तुझे चाहा भूल हुई
तिरे लहराते काकुल को
संवारा भूल हुई
तेरी यादों में खोकर
अज़ीम ख़्वाब सँजोकर
ज़िस्त को बे-सर-ओ-पा
बनाया भूल हुई
दिन का ख़याल न
सियाह रात से बवाल
बा-तरतीव तुझे सोचा
किया भूल हुई
तिरे चरन की कामना
तेरी सूरत से सामना
तेरी तलब में ज़ात को
मिटाया भूल हुई
नूर-ए-माह से चुराकर
फूलों से सजाकर
मैंने तुझको ख़ाना-ए-दिल में
बिठाया भूल हुई
बहर-ए-इश्क़ अज़ीब था
वहीं मेरा नसीब था
किश्ती को जानिब-ए-साहिल
खिसकाया भूल हुई
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Rajdip Kota
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