Thursday, September 9, 2021

वह जा चुकी है!!

(वह जा चुकी है)

किसे ढूंढती हैं तुम्हारी नज़र
इतनी बेताबी-ए-दिल क्यूं
क्यूं जलाएं चराग़-ए-उम्मीद
जब कि तुम्हें मालूम था
इसका कुछ मोल नहीं मिलने वाला
जहान-ए-तसव्वुर का मुरझाया हुआ इक गुंचा
मेहनत-ओ-मशक़्क़त के बाद भी नहीं खिलने वाला
क्यूं उस बे-वफ़ा को बारहा याद करके
अपने दिल को बे-इंतिहा आज़ुर्दा करते हों
तुम्हें पता था
रिफ़ाकत की इब्तिदा से पता था
आफ़त-नसीब दिल को 
उसके गुदाज़-बदन की नर्मी हासिल नहीं
खुलूश तो ये कि इस आलम-ए-दराज़ में 
कोई भी अफ़साना-ए-दिल कामिल नहीं
अहल-ए-दिल की ज़ुबानी कौन सुनता हैं
सब अपने ही किसी अमल तक महदूद हैं
इसी तंग-खयाल से बहर-हाल हिरासां हूं
उनसे दूर मेरा इमरोज़-ओ-फर्दा क्या होगा।
अब इक क़लील-ओ-तवील सफ़र तै करना हैं
उसके बगैर 
उसने दूर
वक्त ने आख़िर सुना दिया अपना अहवाल
मेरे मुकद्दर में कहीं भी उसका नाम-हो-निशान नहीं
मैं जिसके लम्स को पाने बेचैन था
वो मेरा भरम था
जो टूट चुका हैं

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Rajdip Kota




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તને મૈં ક્યાં ક્યાં ન ખોળી!!

તને મૈં ક્યાં ક્યાં ન ખોળી! અંતરના અમિત ઊંડાણમાં! પ્રત્યાશાઓના નૂતન અરણ્યમાં! તને મૈં ક્યાં ક્યાં ન ખોળી! કો વિહગ-ઝુંડ સત્વરે ઊપ...